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श्लोक 3.9.33  |
स्त्रीचापलादेतदुपाहृतं मे
धर्मं च वक्तुं तव क: समर्थ:।
विचार्य बुद्धॺा तु सहानुजेन
यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| स्त्रियों की स्वाभाविक चपलता के कारण ही मैंने ये वस्तुएँ तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत की हैं। वास्तव में तुम्हें धर्म सिखाने में कौन समर्थ है? तुम अपने छोटे भाई के साथ इस विषय में बुद्धिमानीपूर्वक विचार-विमर्श करो। फिर जो उचित समझो, उसे शीघ्रता से करो।॥33॥ |
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| ‘I have presented these things to you because of the natural agility of women. Who is really capable of teaching you Dharma? You should discuss this matter wisely with your younger brother. Then whatever seems right to you, do it quickly.’॥ 33॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे नवम: सर्ग:॥ ९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९॥ |
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