श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 9: सीता का श्रीराम से निरपराध प्राणियों को न मारने और अहिंसा-धर्म का पालन करने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.9.17 
तस्यैव तपसो विघ्नं कर्तुमिन्द्र: शचीपति:।
खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमं भटरूपधृक् ॥ १ ७॥
 
 
अनुवाद
उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए एक दिन शचीपति इंद्र ने योद्धा का रूप धारण किया और हाथ में तलवार लेकर उनके आश्रम में आ पहुंचे।
 
To disturb his penance, Sachipati Indra one day took the form of a warrior and came to his ashram with a sword in his hand.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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