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श्लोक 3.9.12  |
ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मन:।
त्वद्धृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्नि:श्रेयसं हितम्॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| अतः तुम्हें इस घोर कर्म को करने के लिए उद्यत देखकर मेरा मन चिन्ता से भर गया है। तुम्हारी प्रतिज्ञा पालन की प्रतिज्ञा का स्मरण करके मैं तुम्हारा कल्याण कैसे करूँ, इस विषय में सोचता रहता हूँ॥12॥ |
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| ‘Therefore, seeing you ready to commit this dreadful deed, my mind is filled with worry. Thinking of your vow of keeping your promises, I keep thinking about how to bring welfare to you.॥ 12॥ |
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