| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » सर्ग 73: दिव्य रूपधारी कबन्ध का श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक और पम्पासरोवर का मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनि के वन एवं आश्रम का परिचय देकर प्रस्थान करना » श्लोक 23-25 |
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| | | | श्लोक 3.73.23-25  | मतङ्गशिष्यास्तत्रासन्नृषय: सुसमाहिता:॥ २३॥
तेषां भाराभितप्तानां वन्यमाहरतां गुरो:।
ये प्रपेतुर्महीं तूर्णं शरीरात् स्वेदबिन्दव:॥ २४॥
तानि माल्यानि जातानि मुनीनां तपसा तदा।
स्वेदबिन्दुसमुत्थानि न विनश्यन्ति राघव॥ २५॥ | | | | | | अनुवाद | | 'ऐसा कहा जाता है कि पहले वहाँ मतंगे मुनि के शिष्य ऋषिगण रहते थे, जिनका मन सदैव एकाग्र और शान्त रहता था। जब वे अपने गुरु मतंगे मुनि के लिए जंगली फल और मूल लाते और उन्हें ढोते-ढोते थक जाते, तब उनके शरीर से पृथ्वी पर गिरने वाली पसीने की बूँदें उन ऋषियों के तप के प्रभाव से तुरंत ही पुष्पों में बदल जातीं। राघव! चूँकि वे पसीने की बूँदों से उत्पन्न होते हैं, इसलिए वे पुष्प नष्ट नहीं होते॥ 23-25॥ | | | | ‘It is said that earlier the disciples of Matange Muni, Rishis, used to live there, whose minds were always concentrated and peaceful. When they brought wild fruits and roots for their Guru Matange Muni and got tired of carrying them, then the drops of sweat that fell from their bodies on the earth, would immediately turn into flowers due to the effect of the penance of those sages. Raghava! Since they are born from drops of sweat, those flowers do not perish.॥ 23-25॥ | | ✨ ai-generated | | |
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