श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 73: दिव्य रूपधारी कबन्ध का श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक और पम्पासरोवर का मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनि के वन एवं आश्रम का परिचय देकर प्रस्थान करना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  3.73.22-23h 
न तानि कश्चिन्माल्यानि तत्रारोपयिता नर:॥ २२॥
न च वै म्लानतां यान्ति न च शीर्यन्ति राघव।
 
 
अनुवाद
'रघुनन्दन! कोई भी मनुष्य उन पुष्पों को उतारकर धारण नहीं करता। (क्योंकि वहाँ कोई पहुँच ही नहीं सकता) पंपासरोवर के पुष्प न तो मुरझाते हैं और न गिरते हैं॥ 22 1/2॥
 
‘Raghunandan! No human being takes off those flowers and wears them. (Because no one can reach there) The flowers of Pampasarovar neither fade nor fall.॥ 22 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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