श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 73: दिव्य रूपधारी कबन्ध का श्रीराम और लक्ष्मण को ऋष्यमूक और पम्पासरोवर का मार्ग बताना तथा मतङ्गमुनि के वन एवं आश्रम का परिचय देकर प्रस्थान करना  »  श्लोक 16-18h
 
 
श्लोक  3.73.16-18h 
भृशं तान् खादतो मत्स्यान् पम्पाया: पुष्पसंचये॥ १६॥
पद्मगन्धि शिवं वारि सुखशीतमनामयम्।
उद‍्धृत्य स तदाक्लिष्टं रूप्यस्फटिकसंनिभम्॥ १७॥
अथ पुष्करपर्णेन लक्ष्मण: पाययिष्यति।
 
 
अनुवाद
जब तुम पंपासरोवर के पुष्प-समूह के पास मछलियों को चराने की क्रीड़ा में मग्न होगे, तब लक्ष्मण उस सरोवर का जल, जो कमल की गन्ध से सुगन्धित, शुभ, सुखदायक, शीतल, रोगनाशक, पीड़ानाशक तथा चाँदी और स्फटिक के समान स्वच्छ है, कमल के पत्ते में लाकर तुम्हें पिलाएँगे॥16-17 1/2॥
 
When you will be deeply engaged in the sport of feeding the fishes near the flower cluster of Pampasarovar, then Lakshman will bring the water of that lake which is fragrant with the smell of lotus, auspicious, pleasant, cool, disease-destroying, pain-removing and clear like silver and crystal, in a lotus leaf and will give it to you to drink.॥ 16-17 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd