श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 72: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.72.16 
भवितव्यं हि तच्चापि न तच्छक्यमिहान्यथा।
कर्तुमिक्ष्वाकुशार्दूल कालो हि दुरतिक्रम:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इक्ष्वाकुवंश के वीरों में श्रेष्ठ श्री राम! जो भाग्य में लिखा है, उसे कोई नहीं बदल सकता। काल का नियम किसी के लिए भी कठिन है (अतः जो कुछ तुम्हारे साथ घटित हो रहा है, उसे तुम काल या भाग्य का नियम समझकर धैर्य रखो)।॥16॥
 
Shri Ram, the best among the heroes of the Ikshwaku dynasty! No one can change the fate that is destined to happen. The law of time is difficult for anyone (so whatever is happening to you, you should consider it as the law of time or destiny and be patient).॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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