इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे।
अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम्॥ ८॥
दीर्घमायु: स मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत् ।
दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्र: करिष्यति॥ ९॥
अनुवाद
‘यह मेरा रूप युद्धभूमि में इन्द्र के क्रोध के कारण प्राप्त हुआ है। पूर्वकाल में राक्षस होने पर मैंने घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया था और उन्होंने मुझे दीर्घायु का वरदान दिया था। इससे मेरे मन में यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे दीर्घायु का वरदान प्राप्त है; फिर इन्द्र मेरा क्या करेंगे?॥ 8-9॥
‘This form of mine has been acquired due to Indra’s anger in the battlefield. After being a demon in the past, I performed severe penance and pleased Lord Brahma and he blessed me with a long life. Due to this, I developed an illusion or arrogance in my mind that I have been blessed with a long life; then what will Indra do to me?॥ 8-9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥