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ramayan 3.71.34: हे रघुनन्दन! तीनों लोकों में उनसे कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि वे किसी कारणवश पहले ही समस्त लोकों में विचरण कर चुके हैं।'   |   ramayan सर्ग 3.71: कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 71: कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.71.34 
नहि तस्यास्त्यविज्ञातं त्रिषु लोकेषु राघव।
सर्वान् परिवृतो लोकान् पुरा वै कारणान्तरे॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे रघुनन्दन! तीनों लोकों में उनसे कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि वे किसी कारणवश पहले ही समस्त लोकों में विचरण कर चुके हैं।'
 
Raghunandan! Nothing is unknown to him in the three worlds; because for some reason he has already roamed around in all the worlds.'
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकसप्ततितम: सर्ग:॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)