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ramayan 3.71.16-17h: ‘पिताजी! हे राजन! इस शरीर से इस वन में जो कुछ भी मैं देखूँ, उसे ग्रहण करूँ।॥16 1/2॥   |   ramayan सर्ग 3.71: कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 71: कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  3.71.16-17h 
अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम॥ १६॥
यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये।
 
 
अनुवाद
‘पिताजी! हे राजन! इस शरीर से इस वन में जो कुछ भी मैं देखूँ, उसे ग्रहण करूँ।॥16 1/2॥
 
‘Father! O King! Whatever I see in this forest with this body, I should accept it.॥ 16 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)