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श्लोक 3.70.18  |
स्वागतं वां नरव्याघ्रौ दिष्टॺा पश्यामि वामहम्।
दिष्टॺा चेमौ निकृत्तौ मे युवाभ्यां बाहुबन्धनौ॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| हे वीरों! तुम दोनों का स्वागत है। यह मेरा सौभाग्य है कि मैं तुमसे मिला। ये दोनों भुजाएँ मेरे लिए महान बंधन थीं। यह मेरा सौभाग्य है कि तुमने इन्हें काट डाला॥18॥ |
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| ‘You brave men! You both are welcome. It is my great fortune that I have met you. These two arms were a great bondage for me. It is my good fortune that you cut them off.॥ 18॥ |
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