श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 70: श्रीराम और लक्ष्मण का परस्पर विचार करके कबन्ध की दोनों भुजाओं को काट डालना तथा कबन्ध के द्वारा उनका स्वागत  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.70.17 
एवमुक्त: कबन्धस्तु लक्ष्मणेनोत्तरं वच:।
उवाच वचनं प्रीतस्तदिन्द्रवचनं स्मरन्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण के ऐसा कहने पर कबन्ध को इन्द्र की कही हुई बात याद आ गई, और उसने बड़ी प्रसन्नता से लक्ष्मण को उत्तर दिया॥17॥
 
When Lakshmana said this, Kabandha remembered what Indra had said. So he replied to Lakshmana very happily.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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