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श्लोक 3.69.16  |
नाथ पर्वतदुर्गेषु नदीनां पुलिनेषु च।
आयुश्चिरमिदं वीर त्वं मया सह रंस्यसे॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| हे मेरे प्रिय! हे वीर! इस दीर्घ एवं स्थिर जीवन को पाकर तुम मेरे साथ पर्वतों की दुर्गम गुफाओं में तथा नदियों के तट पर सदैव आनन्द मनाओगे।' ॥16॥ |
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| My dear one! Brave one! After getting this long and stable life, you will always enjoy with me in the inaccessible caves of the mountains and on the banks of the rivers.' ॥ 16॥ |
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