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श्लोक 3.68.5  |
किंनिमित्तो जहारार्यां रावणस्तस्य किं मया।
अपराधं तु यं दृष्ट्वा रावणेन हृता प्रिया॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| वह कौन-सा अपराध है जिसके कारण रावण ने मेरी प्रिय पत्नी का हरण किया? और वह अपराध मैंने कब किया? रावण ने आर्या सीता का हरण किस कारण से किया?॥5॥ |
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| What is the crime due to which Ravana abducted my beloved wife? And when did I commit it? For what reason did Ravana abduct Arya Sita?॥ 5॥ |
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