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श्लोक 3.68.27  |
सौमित्रे हर काष्ठानि निर्मथिष्यामि पावकम्।
गृध्रराजं दिधक्ष्यामि मत्कृते निधनं गतम्॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| सुमित्रानंदन! तुम सूखी लकड़ी लाओ, मैं उसे मथकर अग्नि उत्पन्न करूँगी और मेरे लिए मरने वाले इस गिद्ध का अंतिम संस्कार करूँगी॥ 27॥ |
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| Sumitra Nandan! You bring some dry wood, I will churn it to extract fire and perform the last rites of this vulture who has died for me.॥ 27॥ |
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