श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 68: जटायु का प्राण-त्याग और श्रीराम द्वारा उनका दाह-संस्कार  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.68.20 
बहूनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम्।
अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा॥ २०॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! इस राक्षसलोकरूपी दण्डकारण्य में अनेक वर्षों तक सुखपूर्वक रहने के पश्चात् इस पक्षीराज ने यहीं अपना शरीर त्याग दिया है॥20॥
 
Laxman! After living happily for many years in this Dandakaranya, the abode of demons, this king of birds has given up his body here. 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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