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श्लोक 3.68.20  |
बहूनि रक्षसां वासे वर्षाणि वसता सुखम्।
अनेन दण्डकारण्ये विशीर्णमिह पक्षिणा॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| लक्ष्मण! इस राक्षसलोकरूपी दण्डकारण्य में अनेक वर्षों तक सुखपूर्वक रहने के पश्चात् इस पक्षीराज ने यहीं अपना शरीर त्याग दिया है॥20॥ |
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| Laxman! After living happily for many years in this Dandakaranya, the abode of demons, this king of birds has given up his body here. 20॥ |
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