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श्लोक 3.68.12-13  |
येन याति मुहूर्तेन सीतामादाय रावण:।
विप्रणष्टं धनं क्षिप्रं तत्स्वामी प्रतिपद्यते॥ १२॥
विन्दो नाम मुहूर्तोऽसौ न च काकुत्स्थ सोऽबुधत् ।
त्वत्प्रियां जानकीं हृत्वा रावणो राक्षसेश्वर:।
झषवद् बडिशं गृह्य क्षिप्रमेव विनश्यति॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| जिस क्षण रावण सीता को ले गया, उसी क्षण खोई हुई सम्पत्ति उसके स्वामी को शीघ्र ही लौटा दी जाती है । ककुत्स्थ ! वह क्षण 'विन्द' नाम का था, परन्तु राक्षस को यह पता नहीं था । जैसे मछली बांसुरी को पकड़कर मर जाती है, वैसे ही वह भी सीता को ले जाकर शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा ॥ 12-13॥ |
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| ‘The moment in which Ravana took Sita, the lost wealth is soon returned to its owner. Kakutstha! That was the moment called ‘Vind’, but the demon did not know this. Just like a fish catches the flute only to die, in the same way he too will soon perish after taking Sita.॥ 12-13॥ |
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