श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 66: लक्ष्मण का श्रीराम को समझाना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.66.1-2 
तं तथा शोकसंतप्तं विलपन्तमनाथवत्।
मोहेन महता युक्तं परिद्यूनमचेतसम्॥ १॥
तत: सौमित्रिराश्वस्य मुहूर्तादिव लक्ष्मण:।
रामं सम्बोधयामास चरणौ चाभिपीडयन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी दुःख से भरकर अनाथों के समान विलाप करने लगे। वे अत्यन्त दुर्बल और मोह से युक्त हो गए। उनका मन स्वस्थ नहीं रहा। उन्हें ऐसी अवस्था में देखकर सुमित्रापुत्र लक्ष्मण ने उन्हें कुछ देर तक तो सांत्वना दी; फिर उनके चरणों को दबाते हुए उन्हें सांत्वना देने लगे॥1-2॥
 
Shri Ramchandra ji was filled with grief and started wailing like an orphan. He became very weak and full of attachment. His mind was not healthy. Seeing him in this state, Sumitra's son Lakshman consoled him for a while; then he started consoling him while massaging his feet.॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)