| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » सर्ग 65: लक्ष्मण का श्रीराम को समझा-बुझाकर शान्त करना » श्लोक 5 |
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| | | | श्लोक 3.65.5  | चन्द्रे लक्ष्मी: प्रभा सूर्ये गतिर्वायौ भुवि क्षमा।
एतच्च नियतं नित्यं त्वयि चानुत्तमं यश:॥ ५॥ | | | | | | अनुवाद | | 'जैसे चन्द्रमा में सुन्दरता, सूर्य में तेज, वायु में वेग और पृथ्वी में क्षमा निवास करती है, वैसे ही उत्तम यश सदैव आपमें चमकता रहता है।॥5॥ | | | | 'Just as beauty resides in the moon, radiance in the sun, speed in the wind and forgiveness in the earth, similarly the best fame always shines in you. ॥ 5॥ | | ✨ ai-generated | | |
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