श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 64: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा सीता की खोज, आभूषणों के कण और युद्ध के चिह्न देखकर श्रीराम का देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकी पर रोष प्रकट करना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.64.55 
मृदुं लोकहिते युक्तं दान्तं करुणवेदिनम्।
निर्वीर्य इति मन्यन्ते नूनं मां त्रिदशेश्वरा:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
‘मैं लोक-कल्याण में तत्पर, विवेकशील, बुद्धिमान और प्राणियों के प्रति दयावान हूँ, इसीलिए ये इन्द्र आदि देवता मुझे अवश्य ही दुर्बल समझ रहे हैं (इसीलिए इन्होंने सीता की रक्षा नहीं की है)।’ 55॥
 
'I am active in public welfare, rational, intelligent and compassionate towards living beings, that is why these Gods like Indra are certainly considering me weak (that is why they have not protected Sita).' 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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