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श्लोक 3.64.53  |
भक्षितायां हि वैदेह्यां हृतायामपि लक्ष्मण।
के हि लोके प्रियं कर्तुं शक्ता: सौम्य ममेश्वरा:॥ ५३॥ |
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| अनुवाद |
| हे लक्ष्मण! जब विदेहनन्दिनी राक्षसों द्वारा ग्रास बन गई अथवा उनका अपहरण कर लिया गया और कोई भी उनकी सहायता करने नहीं आया, तब इस संसार में ऐसा कौन पुरुष है जो मुझसे प्रेम करने में समर्थ हो? 53. |
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| 'Gentle Lakshmana! When Videhanandini became prey to the demons or was abducted by them and no one came to help, then who is the man in this world who is capable of loving me? 53. |
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