श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 64: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा सीता की खोज, आभूषणों के कण और युद्ध के चिह्न देखकर श्रीराम का देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकी पर रोष प्रकट करना  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  3.64.13-14h 
ज्ञातिवर्गविहीनस्य वैदेहीमप्यपश्यत:॥ १३॥
मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रत:।
 
 
अनुवाद
मैं तो अपने मित्रों और सम्बन्धियों से विमुख हो ही चुका हूँ, अब सीता के दर्शन से भी वंचित रह जाऊँगा; अब उसकी चिन्ता में जागते रहने से मेरी सारी रातें बहुत लम्बी हो जाएँगी॥13 1/2॥
 
'I was already separated from my friends and relatives, and now I will be deprived of even the sight of Sita; now all my nights will become very long because of my constant wakefulness worrying about her.॥ 13 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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