| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » सर्ग 63: श्रीराम का विलाप » श्लोक 8 |
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| | | | श्लोक 3.63.8  | तौ लोहितस्य प्रियदर्शनस्य
सदोचितावुत्तमचन्दनस्य।
वृत्तौ स्तनौ शोणितपङ्कदिग्धौ
नूनं प्रियाया मम नाभिपात:॥ ८॥ | | | | | | अनुवाद | | मेरे प्रियतम के दोनों गोल स्तन, जो सदैव लाल चंदन से लेपने योग्य थे, अवश्य ही रक्त के कीचड़ से सन गए होंगे। हाय! इतना होने पर भी मेरा शरीर नहीं गिरता॥8॥ | | | | ‘My beloved's two round breasts, which were always worthy of being smeared with red sandalwood, must have surely got covered in the mud of blood. Alas! Even after all this my body does not collapse.॥ 8॥ | | ✨ ai-generated | | |
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