श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 63: श्रीराम का विलाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.63.15 
कामं त्विदं पुष्पितवृक्षषण्डं
नानाविधै: पक्षिगणैरुपेतम्।
वनं प्रयाता नु तदप्ययुक्त-
मेकाकिनी सातिबिभेति भीरु:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'यह भी सम्भव है कि वह फूलों से भरे और नाना प्रकार के पक्षियों से भरे इस वन में विचरण करने गई हो; किन्तु यह भी ठीक नहीं लगता; क्योंकि वह डरपोक लड़की थी और वन में अकेले जाने से बहुत डरती थी।
 
'It is possible that she went to wander in this forest full of flowering trees and inhabited by various kinds of birds; but this also does not seem right; because she was a timid girl and was very afraid of going alone in the forest.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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