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श्लोक 3.63.11  |
मया विहीना विजने वने सा
रक्षोभिराहृत्य विकृष्यमाणा।
नूनं विनादं कुररीव दीना
सा मुक्तवत्यायतकान्तनेत्रा॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| 'मेरी अनुपस्थिति में राक्षस उसे निर्जन वन में घसीटकर ले गए होंगे और बड़े-बड़े सुन्दर नेत्रों वाली वह जानकी कुररी के समान अत्यन्त करुण स्वर से विलाप कर रही होगी॥ 11॥ |
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| 'In my absence the demons must have dragged her away in the deserted forest and that Janaki with large and beautiful eyes must have been wailing like a Kurri in a very pitiable manner.॥ 11॥ |
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