| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » सर्ग 63: श्रीराम का विलाप » श्लोक 10 |
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| | | | श्लोक 3.63.10  | तां हारपाशस्य सदोचितान्तां
ग्रीवां प्रियाया मम सुव्रताया:।
रक्षांसि नूनं परिपीतवन्ति
शून्ये हि भित्त्वा रुधिराशनानि॥ १०॥ | | | | | | अनुवाद | | हाय! उत्तम व्रतों का पालन करने वाली मेरी प्रियतमा का गला तो सदैव हार से सुशोभित होने के योग्य था, परंतु रक्तपिपासु राक्षसों ने उसे निर्जन वन में फाड़कर उसका रक्त पी लिया होगा॥10॥ | | | | 'Alas! The neck of my beloved, who observes excellent vows, was worthy of being adorned with a necklace all the time, but the blood-thirsty demons must have torn her apart in the desolate forest and drunk her blood.॥10॥ | | ✨ ai-generated | | |
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