| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » सर्ग 61: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा सीता की खोज और उनके न मिलने से श्रीराम की व्याकुलता » श्लोक 14-17h |
|
| | | | श्लोक 3.61.14-17h  | मा विषादं महाबुद्धे कुरु यत्नं मया सह।
इदं गिरिवरं वीर बहुकन्दरशोभितम्॥ १४॥
प्रियकाननसंचारा वनोन्मत्ता च मैथिली।
सा वनं वा प्रविष्टा स्यान्नलिनीं वा सुपुष्पिताम्॥ १५॥
सरितं वापि सम्प्राप्ता मीनवञ्जुलसेविताम्।
वित्रासयितुकामा वा लीना स्यात् कानने क्वचित्॥ १६॥
जिज्ञासमाना वैदेही त्वां मां च पुरुषर्षभ। | | | | | | अनुवाद | | महामते! आप दुःखी न हों; मेरे साथ मिलकर जानकी को ढूँढ़ने का प्रयत्न करें। वीर! यह जो ऊँचा पर्वत सामने दिखाई दे रहा है, वह अनेक गुफाओं से सुशोभित है। मिथिला की राजकुमारी को वन में विचरण करना प्रिय है, वह वन की शोभा देखकर आनन्द से उन्मत्त हो जाती है; इसलिए वह वन में गई होगी, अथवा सुन्दर कमल पुष्पों से युक्त इस सरोवर के तट पर अथवा मछलियों और सेज से सुशोभित नदी के तट पर पहुँच गई होगी। अथवा, हे महामते! हमें डराने की इच्छा से, इस जिज्ञासा से कि हम दोनों उसे ढूँढ़ पाते हैं या नहीं, वह वन में कहीं छिप गई होगी।॥ 14-16 1/2॥ | | | | ‘Mahamate! Do not be sad; try to find Janaki with me. Braveheart! This tall mountain that is visible in front is decorated with many caves. Mithila princess likes to roam in the forest, she becomes mad with joy on seeing the beauty of the forest; therefore she must have gone to the forest, or must have reached the bank of this lake filled with beautiful lotus flowers or the river decorated with fishes and sedge. Or, great man! With the desire to scare us, she must have hidden herself somewhere in the forest out of curiosity whether we both can find her or not.॥ 14-16 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|