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श्लोक 3.58.4  |
यां विना नोत्सहे वीर मुहूर्तमपि जीवितुम्।
क्व सा प्राणसहाया मे सीता सुरसुतोपमा॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'वीर! वह सुन्दरी दिव्य कन्या सीता कहाँ है, जिसके बिना मैं दो क्षण भी नहीं रह सकता और जो मेरी जीवनसंगिनी है? |
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| 'Valiant! Where is Sita, the beautiful celestial maiden, without whom I cannot live even for two moments and who is the companion of my life? |
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