श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 56: सीता का श्रीराम के प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावण को फटकारना तथा रावण की आज्ञा से राक्षसियों का उन्हें अशोकवाटिका में ले जाकर डराना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.56.7 
तस्य ज्याविप्रमुक्तास्ते शरा: काञ्चनभूषणा:।
शरीरं विधमिष्यन्ति गङ्गाकूलमिवोर्मय:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जैसे गंगाजी की लहरें उसके किनारों को नष्ट कर देती हैं, उसी प्रकार भगवान राम के धनुष की डोरी से छूटे हुए स्वर्ण बाण तुम्हारे शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर देंगे॥ 7॥
 
‘Just as the surging waves of the Ganges erode its banks, similarly the golden arrows shot from the string of Lord Rama's bow will rip your body into pieces.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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