श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 56: सीता का श्रीराम के प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावण को फटकारना तथा रावण की आज्ञा से राक्षसियों का उन्हें अशोकवाटिका में ले जाकर डराना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.56.20 
क्रीडन्ती राजहंसेन पद्मषण्डेषु नित्यश:।
हंसी सा तृणमध्यस्थं कथं द्रक्ष्येत मद्गुकम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'वह हंस जो सदैव कमल के फूलों के बीच हंसों के साथ खेलता रहता है, वह घास के बीच रहने वाले जल कौवे को कैसे देख सकता है?
 
'How can that swan who always plays with the swans among the lotus flowers look at the water crow that lives among the grass?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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