श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 56: सीता का श्रीराम के प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावण को फटकारना तथा रावण की आज्ञा से राक्षसियों का उन्हें अशोकवाटिका में ले जाकर डराना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.56.19 
तथाहं धर्मनित्यस्य धर्मपत्नी दृढव्रता।
त्वया स्प्रष्टुं न शक्याहं राक्षसाधम पापिना॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार मैं नित्य धर्मात्मा भगवान् श्री रामजी की पत्नी हूँ और पतिव्रता धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करती हूँ (अतः मैं यज्ञवेदी के समान हूँ) और हे दुष्ट राक्षस! तू महापापी है (अतः तू चाण्डाल के समान है); अतः तू मुझे स्पर्श नहीं कर सकता॥19॥
 
‘In the same way, I am the wife of the ever virtuous Lord Shri Ram and firmly follow the duty of being faithful to my husband (so I am like the sacrificial altar) and you, wicked demon! You are a great sinner (so you are like a Chandala); therefore you cannot touch me.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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