श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 56: सीता का श्रीराम के प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावण को फटकारना तथा रावण की आज्ञा से राक्षसियों का उन्हें अशोकवाटिका में ले जाकर डराना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.56.18 
न शक्या यज्ञमध्यस्था वेदि: स्रुग्भाण्डमण्डिता।
द्विजातिमन्त्रसम्पूता चण्डालेनावमर्दितुम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'यज्ञशाला के मध्य में जो वेदी है, जो द्विजातियों के मन्त्रों से पवित्र की गई है और जो स्रुक, स्रुव आदि यज्ञपात्रों से सुशोभित है, उस पर चाण्डाल अपने पैर नहीं रख सकता ॥18॥
 
'The Chandala cannot place his feet on the altar in the middle of the sacrificial hall, which is sanctified by the mantras of the Dwijatis and which is decorated with sacrificial vessels like Sruk, Sruva etc. 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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