श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 55: रावण का सीता को अपने अन्तःपुर का दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जाने के लिये समझाना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.55.24 
न शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद‍्धुं महाजव:।
दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं विमला: शिखा:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
आकाश में बड़े वेग से चलने वाली वायु को रस्सियों से नहीं बाँधा जा सकता और न प्रज्वलित अग्नि की शुद्ध ज्वालाओं को हाथ में पकड़ा जा सकता है॥ 24॥
 
‘The wind blowing with great speed in the sky cannot be tied with ropes nor the pure flames of a blazing fire cannot be caught in hands.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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