श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 55: रावण का सीता को अपने अन्तःपुर का दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जाने के लिये समझाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.55.18 
साधु किं तेऽन्यथाबुद्‍ध्या रोचयस्व वचो मम।
भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
मेरे कल्याणकारी वचनों को स्वीकार करो; उनके विपरीत विचार करने से तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे स्वीकार करो। मैं दुःखी हूँ; मुझ पर दया करो॥18॥
 
‘Accept my benevolent words—like them; what will you gain by thinking the opposite? Accept me. I am suffering; have mercy on me.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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