श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 51: जटायु तथा रावण का घोर युद्ध और रावण के द्वारा जटायु का वध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.51.2 
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे।
बभूव वातोद‍्धुतयोर्मेघयोर्गगने यथा॥ २॥
 
 
अनुवाद
उस महासमर में वे दोनों एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार करने लगे, मानो आकाश में वायु से उड़े हुए दो मेघसमूह आपस में टकरा गए हों॥2॥
 
In that great battle they both started attacking each other fiercely, as if two masses of clouds blown by the wind in the sky had collided with each other.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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