श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 50: जटायु का रावण को सीताहरण के दुष्कर्म से निवृत्त होने के लिये समझाना और अन्त में युद्ध के लिये ललकारना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.50.2 
तत: पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्ड: खगोत्तम:।
वनस्पतिगत: श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
पक्षियों में श्रेष्ठ जटायु का शरीर पर्वत शिखर के समान ऊँचा था और उसकी चोंच अत्यन्त तीक्ष्ण थी। वृक्ष पर बैठे हुए उसने रावण के प्रति ये शुभ वचन कहे-॥2॥
 
The body of the best of the birds, Jatayu, was as tall as a mountain peak and his beak was very sharp. While sitting on the tree, he spoke these auspicious words towards Ravana -॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)