श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 5: श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर जाना, देवताओं का दर्शन करना और मुनि से सम्मानित होना तथा शरभङ्ग मुनि का ब्रह्मलोक-गमन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.5.38 
एष पन्था नरव्याघ्र मुहूर्तं पश्य तात माम्।
यावज्जहामि गात्राणि जीर्णां त्वचमिवोरग:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
नरश्रेष्ठ! यही मार्ग है, परन्तु हे! तुम यहाँ दो घड़ी रुककर मेरी ओर तब तक देखते रहो, जब तक मैं अपने इन जीर्ण-शीर्ण अंगों को उसी प्रकार त्याग न दूँ, जैसे साँप अपने पुराने केंचुल को त्याग देता है। 38॥
 
'Narshrestha! This is the way, but oh! Stay here for a couple of hours and look at me until I give up these dilapidated body parts of mine like a snake gives up its old slough.' 38॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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