श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 5: श्रीराम, लक्ष्मण और सीता का शरभङ्ग मुनि के आश्रम पर जाना, देवताओं का दर्शन करना और मुनि से सम्मानित होना तथा शरभङ्ग मुनि का ब्रह्मलोक-गमन  »  श्लोक 10-12
 
 
श्लोक  3.5.10-12 
गन्धर्वामरसिद्धाश्च बहव: परमर्षय:॥ १०॥
अन्तरिक्षगतं देवं गीर्भिरग्रॺा भिरैडयन्।
सह सम्भाषमाणे तु शरभङ्गेन वासवे॥ ११॥
दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।
रामोऽथ रथमुद्दिश्य भ्रातुर्दर्शयताद्भुतम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उस समय अनेक गन्धर्व, देवता, सिद्ध और महर्षि आकाश में बैठे हुए देवेन्द्र की उत्तम वाणी से स्तुति कर रहे थे और देवराज इन्द्र शरभंग मुनि के साथ वार्तालाप कर रहे थे। शतक्रतु इन्द्र को वहाँ देखकर श्री राम ने अपनी अँगुली से उनके अद्भुत रथ की ओर संकेत करके उसे अपने भाई को दिखाया और लक्ष्मण से इस प्रकार कहा -॥10-12॥
 
At that time many Gandharvas, Gods, Siddhas and Maharishis were praising Devendra seated in the sky with excellent words and Devraj Indra was conversing with Sharabhang Muni. After seeing Shatakratu Indra there, Shri Ram pointed towards his wonderful chariot with his finger and showed it to his brother and said to Lakshmana as follows -॥10-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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