श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 48: रावण के द्वारा अपने पराक्रम का वर्णन और सीता द्वारा उसको कड़ी फटकार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.48.7 
मम संजातरोषस्य मुखं दृष्ट्वैव मैथिलि।
विद्रवन्ति परित्रस्ता: सुरा: शक्रपुरोगमा:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
‘मिथिलेशकुमारी! जब मैं क्रोधित होती हूँ, तब इन्द्र सहित समस्त देवता मेरा मुख देखकर ही भय से काँप उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं।
 
‘Mithileshkumari! When I become furious, all the gods including Indra tremble with fear just by seeing my face and run away here and there.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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