श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 48: रावण के द्वारा अपने पराक्रम का वर्णन और सीता द्वारा उसको कड़ी फटकार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.48.5 
मद्भयार्त: परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत्।
कैलासं पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'तुम मेरे भय से पीड़ित हो, महारथी कुबेर ने इस समय अपनी समृद्ध लंका नगरी को छोड़कर श्रेष्ठ कैलाश पर्वत पर शरण ली है। 5॥
 
'You are suffering from the fear of me, the great warrior Kuber has left his prosperous city of Lanka and has taken refuge in the best mountain Kailash at this time. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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