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ramayan 3.47.37: "पापी निशाचर! तू सियार है और मैं सिंहनी। मैं तेरे लिए अत्यंत दुर्लभ हूँ। क्या तू मुझे यहाँ लाना चाहता है? अरे! जैसे सूर्य की किरणों को कोई छू नहीं सकता, वैसे ही तू मुझे भी नहीं छू सकता।"   |   ramayan सर्ग 3.47: सीता का रावण को अपना और पति का परिचय देकर वन में आने का कारण बताना, रावण का उन्हें अपनी पटरानी बनाने की इच्छा प्रकट करना और सीता का उसे फटकारना   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 47: सीता का रावण को अपना और पति का परिचय देकर वन में आने का कारण बताना, रावण का उन्हें अपनी पटरानी बनाने की इच्छा प्रकट करना और सीता का उसे फटकारना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.47.37 
त्वं पुनर्जम्बुक: सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्लभाम्।
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुमादित्यस्य प्रभा यथा॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
"पापी निशाचर! तू सियार है और मैं सिंहनी। मैं तेरे लिए अत्यंत दुर्लभ हूँ। क्या तू मुझे यहाँ लाना चाहता है? अरे! जैसे सूर्य की किरणों को कोई छू नहीं सकता, वैसे ही तू मुझे भी नहीं छू सकता।"
 
‘Sinful night-walker! You are a jackal and I am a lioness. I am very rare for you. Do you wish to get me here? Oh! Just like no one can touch the sun's rays, in the same way you cannot even touch me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)