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श्लोक 3.45.39  |
तामार्तरूपां विमना रुदन्तीं
सौमित्रिरालोक्य विशालनेत्राम्।
आश्वासयामास न चैव भर्तु-
स्तं भ्रातरं किंचिदुवाच सीता॥ ३९॥ |
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| अनुवाद |
| सीता को बड़ी-बड़ी आँखों से व्यथा से रोते हुए देखकर सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण ने उन्हें चुपचाप सान्त्वना दी, किन्तु सीता ने उस समय अपने देवर से कुछ नहीं कहा। |
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| Seeing Sita with big eyes crying in anguish, Sumitra's son Lakshman consoled her silently, but Sita did not say anything to her brother-in-law at that time. |
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