| 'लक्ष्मण! श्री रामजी से वियोग होने पर मैं या तो गोदावरी नदी में डूब मरूँगी, या गले में फाँसी लगा लूँगी, या पर्वत की दुर्गम चोटी पर चढ़कर वहाँ से अपना शरीर नीचे फेंक दूँगी, या तीव्र विष पी लूँगी, या जलती हुई अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगी, परन्तु श्री रघुनाथजी के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का स्पर्श नहीं करूँगी।'॥36-37॥ |