श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 45: सीता के मार्मिक वचनों से प्रेरित होकर लक्ष्मण का श्रीराम के पास जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.45.23 
नैव चित्रं सपत्नेषु पापं लक्ष्मण यद् भवेत्।
त्वद्विधेषु नृशंसेषु नित्यं प्रच्छन्नचारिषु॥ २३॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! तुम्हारे समान क्रूर और गुप्त शत्रुओं के मन में भी ऐसे पापमय विचार उत्पन्न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है॥ 23॥
 
'Lakshmana! It is not surprising that such sinful thoughts should arise in the minds of enemies as cruel and ever hidden as you.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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