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श्लोक 3.45.23  |
नैव चित्रं सपत्नेषु पापं लक्ष्मण यद् भवेत्।
त्वद्विधेषु नृशंसेषु नित्यं प्रच्छन्नचारिषु॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| 'लक्ष्मण! तुम्हारे समान क्रूर और गुप्त शत्रुओं के मन में भी ऐसे पापमय विचार उत्पन्न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है॥ 23॥ |
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| 'Lakshmana! It is not surprising that such sinful thoughts should arise in the minds of enemies as cruel and ever hidden as you.॥ 23॥ |
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