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श्लोक 3.44.15-16h  |
शरीरं मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तम: ॥ १ ५॥
मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभ:। |
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| अनुवाद |
| वह वज्र के समान तेजस्वी उत्तम बाण मृगरूपी मारीच के शरीर को छेदकर उसके हृदय को भी छेद गया ॥15 1/2॥ |
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| That excellent arrow, as bright as a thunderbolt, pierced the body of Maricha in the form of a deer and also pierced his heart. ॥ 15 1/2॥ |
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