श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 44: श्रीराम के द्वारा मारीच का वध और उसके द्वारा सीता और लक्ष्मण के पुकारने का शब्द सुनकर श्रीराम की चिन्ता  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  3.44.15-16h 
शरीरं मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तम: ॥ १ ५॥
मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभ:।
 
 
अनुवाद
वह वज्र के समान तेजस्वी उत्तम बाण मृगरूपी मारीच के शरीर को छेदकर उसके हृदय को भी छेद गया ॥15 1/2॥
 
That excellent arrow, as bright as a thunderbolt, pierced the body of Maricha in the form of a deer and also pierced his heart. ॥ 15 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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