श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 43: कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना, लक्ष्मण को सीता की रक्षा का भार सौंप राम का मृग के लिये जाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.43.7 
अस्य मायाविदो माया मृगरूपमिदं कृतम्।
भानुमत् पुरुषव्याघ्र गन्धर्वपुरसंनिभम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'पुरुषसिंह! यह अनेक प्रकार की मायाओं को जानता है। इसके विषय में जो माया सुनी गई है, वही इस प्रकाशमान मृग में परिणत हो गई है। यह भी गंधर्व नगर के समान केवल दिखावा है (इसमें कोई वास्तविकता नहीं है)।
 
'Purushasingh! This one knows many kinds of illusions. The illusion that has been heard of him has transformed into this luminous deer. This one is just for show like the Gandharva city (there is no reality in it).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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