श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 43: कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना, लक्ष्मण को सीता की रक्षा का भार सौंप राम का मृग के लिये जाना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.43.48 
यावद् गच्छामि सौमित्रे मृगमानयितुं द्रुतम्।
पश्य लक्ष्मण वैदेह्या मृगत्वचि गतां स्पृहाम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रापुत्र लक्ष्मण! देखो, विदेहनन्दिनी इस मृग की खाल पाने के लिए कितनी उत्सुक है, इसलिए मैं तुरन्त ही इस मृग को लाने जा रहा हूँ।'
 
'Sumitra's son Lakshman! See how eager Videhanandini is to get hold of the skin of this deer, so I am going immediately to bring this deer. 48.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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