श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 43: कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना, लक्ष्मण को सीता की रक्षा का भार सौंप राम का मृग के लिये जाना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.43.38 
यदि वायं तथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण।
मायैषा राक्षसस्येति कर्तव्योऽस्य वधो मया॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'लक्ष्मण! यदि यह मृग ठीक वैसा ही है जैसा आप मुझे बता रहे हैं, भले ही यह राक्षस का भ्रम मात्र ही क्यों न हो, तो मुझे इसे अवश्य मारना चाहिए।
 
'Lakshmana! If this deer is exactly as you are telling me, even if it is just an illusion of the demon, I must kill it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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