श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 43: कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना, लक्ष्मण को सीता की रक्षा का भार सौंप राम का मृग के लिये जाना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.43.30 
कस्य रूपमिदं दृष्ट्वा जाम्बूनदमयप्रभम्।
नानारत्नमयं दिव्यं न मनो विस्मयं व्रजेत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
'विभिन्न प्रकार के रत्नों से सुसज्जित उसके स्वर्णिम दिव्य रूप को देखकर कौन आश्चर्यचकित नहीं होगा?
 
'Who would not be astonished to see its golden divine form decorated with various kinds of gems?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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