श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 43: कपटमृग को देखकर लक्ष्मण का संदेह, सीता का उस मृग को ले आने के लिये श्रीराम को प्रेरित करना, लक्ष्मण को सीता की रक्षा का भार सौंप राम का मृग के लिये जाना  »  श्लोक 22-24
 
 
श्लोक  3.43.22-24 
तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा।
तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा॥ २२॥
बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम्।
इति सीतावच: श्रुत्वा दृष्ट्वा च मृगमद्भुतम्॥ २३॥
लोभितस्तेन रूपेण सीतया च प्रचोदित:।
उवाच राघवो हृष्टो भ्रातरं लक्ष्मणं वच:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
सुवर्णमय केशों से सुशोभित, नीलमणि के समान सींगों वाले, उदित होते सूर्य के समान कान्ति वाले और नक्षत्रों के समान बिन्दुरूप कांति वाले उस मृग को देखकर श्री रामचन्द्रजी का मन भी विस्मित हो गया। सीता के उपरोक्त वचन सुनकर, उस मृग के अद्भुत रूप को देखकर, उसके रूप से मोहित होकर और सीता से प्रेरित होकर, हर्ष में भरे हुए श्री राम ने अपने भाई लक्ष्मण से कहा - 22-24॥
 
Seeing that deer adorned with golden hair, horns like an indigo gem, radiance like the rising sun and a point-like glow like the constellations, even Shri Ramchandraji's mind was astounded. Hearing the above words of Sita, seeing the wonderful form of that deer, being attracted by its form and inspired by Sita, Shri Ram, filled with joy, said to his brother Lakshman - 22-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)